October 16, 2021

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बिहार पंचायत चुनाव : महिलाओं की भागीदारी बढ़ी, फिर भी फेमस हैं मुखिया पति!

पटना. बिहार में पंचायत चुनाव (Bihar Panchayat Elections) का पहला चरण 24 सितंबर से शुरू हो रहा है . पहले दो चरण के लिए नामांकन प्रक्रिया भी पूरी कर ली गयी है. इस बार पहले दो चरणों के लिए महिलाओं ने पुरुषों की अपेक्षा अधिक संख्या में नामांकन किया है. पिछले कुछ सालों से पंचायत चुनाव में निश्चित तौर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. इसकी एक बड़ी वजह पंचायत चुनाव में महिलाओं को मिलने वाला 50 प्रतिशत आरक्षण(Reservation in Panchayat Elections) भी है. लेकिन, इन सबके बीच बड़ी चिंताजनक बात यह है कि भले ही महिलाएं चुनाव लड़ रही हों और जीत भी रही हों, लेकिन ज्यादातर मामलों में उनके अधिकांश कार्यों की जिम्मेदारी उनके पति ही निभाते हैं और यही कारण है कि बिहार में ‘मुखिया पति’ (Mukhiya Pati) का पद भी बहुत फेमस है. भले ही यह पद सरकारी न हो, लेकिन पंचायतों में इस पद की खूब हनक देखी जाती है.

पंचायत चुनाव के पहले दो चरणों के लिए 44 जिलों के 70 प्रखंडों में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में नामांकन किया है. बात अगर पहले चरण की करें तो इसके लिए 7235 पुरुषों ने और 8093 महिलाओं उम्मीदवारों ने नामांकन किया है. वहीं दूसरे चरण में पुरुषों और महिलाओं के बीच का अंतर और बड़ा हो गया. इसमें जहां 36111 पुरुषों ने नामांकन किया वहीं 40168 महिला उम्मीदवारों का नामांकन हुआ है.

नहीं बढ़ पायी कार्यक्षेत्र की ज़िम्मेदारी

भले ही पंचायत चुनाव में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ा हो लेकिन उनके कार्यक्षेत्र की ज़िम्मेदारी अब भी सीमित ही नजर आती है. अधिकांश पंचायतों से ऐसी खबरें आती रहती हैं, जहां महिला मुखिया के पति ही उनका सारा काम करते हैं. महिलाएं सिर्फ चेहरा बनकर रह जाती हैं. आप अक्सर ऐसी खबरें पढ़ते होंगे जिसमें मुखिया पति द्वारा गांव में पैसे बांटने, गांव के सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप करने, नर्तकियों का डांस कराने, किसी के साथ मारपीट करने और दबंगई दिखाते जैसे मामले नजर आते ही होंगे.

अभी पिछले हफ्ते ही मोतिहारी जिले के एक पंचायत का वीडियो सामने आया था जिसमे मुखिया पति डांसर को पैसे देते नजर आ रहे थे. इसके अलावा भी दूसरे जिलों से ऐसे मामले अक्सर आ रहे हैं जहां मुखिया पति अपने पावर का इस्तेमाल कर अनैतिक कार्य में संलिप्त पाये जाते हैं. रोहतास जिले की एक महिला मुखिया नाम न छापने की शर्त पर बताती हैं कि भले ही वो मुखिया के पद पर हो लेकिन, अभी भी उनका रूटीन पहले जैसा ही है, वो घर के सारे काम करती हैं और उनके पति ही मुखिया पद वाली अधिकांश ज़िम्मेदारी को उठाते हैं.

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार पत्रकार अरुण कुमार पांडेय का कहना है कि बिहार समेत दूसरे राज्यों में इस तरह की तस्वीर कई सालों से देखने को मिलती रही है. भले ही चुनाव में महिलाओं को आरक्षण दे दिया गया है और महिलाएं चुनाव जीत भी रही हैं लेकिन अधिकांश मामलों में उनके पद की ज़िम्मेदारी उनके पति ही उठाते हैं. ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ पंचायत चुनाव तक सीमित है विधानसभा चुनाव में भी महिला प्रतिनिधियों के कई मामलों में उनका कार्य उनके पति ही देखते हैं.

अरुण पांडेय कहते हैं कि इसकी एक बड़ी वजह है कि अभी भी हमारा समाज पुरुष प्रधान ही माना जाता है, महिलाओं को अभी भी लोग गृहिणी की नजर से ही देखते हैं. लेकिन, अब यह अतिआवश्यक है कि इस भ्रम को पूरी तरह से तोड़ा जाये. हालांकि ऐसा नहीं है कि हर पंचायत में ऐसी स्थिति होती है कई पंचायतों में महिला मुखिया खुद अपने कार्य की जिम्मेदारी उठाए हुये फेमस भी हो रही हैं.