October 21, 2021

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जीते तो टिके, हारे तो गायब; कन्हैया के बहाने शेखर सुमन से शत्रुघ्न सिन्हा तक की पड़ताल, बिहार में कांग्रेस का संकट

कांग्रेस (Bihar Congress) के लिए यह बड़ा संकट है। बड़े नाम वाले नेता आते हैं। चुनाव जीत गए तो टिकते भी हैं, लेकिन हार गए तो पार्टी को यह खबर भी नहीं लगती है कि नेताजी कहां चले गए।

हालांकि, दूसरे नेताओं की तुलना में कन्हैया को लेकर थोड़ा इत्मीनान का भाव है। इसलिए कि कांग्रेस के पास अच्छे वक्ता की कमी थी। कन्हैया को लग रहा था कि सीपीआइ उनके कद लायक संगठन नहीं है। दोनों एक-दूसरे की भरपाई कर सकते हैं।

अभिनेता शेखर सुमन (Shekhar Suman) 2014 के चुनाव में पटना साहिब से कांग्रेस के उम्मीदवार बने थे। खूब तामझाम हुआ था। हार के बाद प्रदेश मुख्यालय सदाकत आश्रम (Sadaquat Ashram) का मुंह नहीं देखा। उसके पांच साल बाद बड़े फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा (Shatrughan Sinha) आए। 2019 में पटना साहिब से चुनाव लड़े। हारने के बाद भी साल भर सक्रिय रहे। साल भर बाद हुए विधानसभा चुनाव में पुत्र को कांग्रेस का टिकट दिलवाया। उसके बाद कांग्रेसी और शत्रुघ्न सिन्हा- दोनों एक-दूसरे को भूलने लगे।

(BJP) के सांसद रहे उदय सिंह पप्पू खुद को खानदानी कांग्रेसी बता कर 2019 में दाखिल हुए। चुनाव हारे और सदाकत आश्रम का रास्ता भूल गए। बाहुबली निर्दलीय विधायक अनंत सिंह (Anant Singh) की पत्नी नीलिमा सिंह मुंगेर से चुनाव लड़ी थीं। चुनाव में अनंत सिंह सक्रिय रहे। परिणाम निकलने के साथ ही दोनों का रूख बदल गया। कांग्रेस में दोनों की सक्रियता नजर नहीं आ रही है।

प्रेमचंद्र मिश्रा (Prem Chandra Mishra) कहते हैं कि कई नेता आए और गए। जहां तक कन्हैया कुमार का सवाल है, हम उम्मीद करते हैं कि वे पार्टी में बने रहेंगे। कन्हैया अच्छे वक्ता हैं। धर्मनिरपेक्ष पृष्ठभूमि से आए हैं। कांग्रेस में उनका सम्मान करेगी। इससे पहले जो नेता आकर चले गए हैं, उनका उद्देश्य सीमित था। वे टिकट के लिए ही पार्टी में शामिल हुए थे। कन्हैया के साथ यह पक्ष नहीं है।