December 8, 2021

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एमपी के जोबट-खंडवा में बीजेपी जीत की ओर

देश में 3 लोकसभा और 13 राज्यों की 29 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में रोचक मुकाबला देखने को मिल रहा है। मध्य प्रदेश में खंडवा लोकसभा और जोबट विधानसभा सीट पर भाजपा को बड़ी बढ़त मिल गई है।तीनों लोकसभा सीटों पर मौजूदा सदस्यों के निधन के चलते उपचुनाव हुए हैं। हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट भाजपा के रामस्वरूप शर्मा के निधन से, मध्यप्रदेश की खंडवा संसदीय सीट भाजपा के नंद कुमार सिंह चौहान के निधन से और दादरा और नगर हवेली सीट मोहन डेलकर के निधन से खाली हुई थी। दादरा और नगर हवेली से शिवसेना कैंडिडेट आगे हैं। यहां 7 बार के निर्दलीय सांसद दिवंगत मोहन डेलकर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद उनकी पत्नी कलावती डेलकर चुनाव लड़ रही हैंराजस्थान की दो विधानसभा सीटों पर मतगणना जारी है। मानी जा रही है। यह सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है. धारियावाड़ से नागराज मीणा को भाजपा प्रत्याशी खेत सिंह मीणा के खिलाफ मैदान में उतारा है .जोबट और खंडवा में बीजेपी जीत की ओर बढ़ रही है। खंडवा में भी 40 हजार से अधिक वोटों से भाजपा के ज्ञानेश्वर पाटिल कांग्रेस के राजनारायण सिंह पुरनी से बढ़त लिए हुए हैं। पृथ्वीपुर में भाजपा ने सातवां राउंड फिर जीत लिया है। जोबट से बीजेपी ने सुलोचना रावत को उम्मीदवार बनाया है।

4. जन्म देने और गोद लेने वाली मांओं की मैटरनिटी लीव में फर्क के खिलाफ लड़ रही ये मां, लोगों का मिल रहा साथ

मैं अनाथालय के अंदर घुसी और दो नन्हें-नन्हें बच्चे मुझसे आकर चिपट गए। शायद उन्हें किसी ने पहले ही बता दिया था कि आज तुम्हारे मम्मी-पापा आने वाले हैं। उनकी इस लिपटन ने मेरे आंचल में ममता की बूंदें और कंधों पर जिम्मेदारी का अहसास छिटक दिया, लेकिन इन बच्चों की देखभाल के लिए मेरी कंपनी ने 6 हफ्तों का समय दिया। बस यहीं से गोद लेने वाली और जन्म देने वाली मां के लिए मातृत्व लाभ में भेदभाव के खिलाफ मेरी लड़ाई शुरू हो गई। ये शब्द हैं, बैंग्लोर की 32 साल की वकील हमसानंदिनी नंदूरी के।

जब पहली बार बच्चों ने पसंद की चीजें
हमारी भाषा में भी अंतर था। इन्हें अंग्रेजी सिखाई। मेरी बेटी पांच साल की थी और पांच साल तक बच्चा अपना एक माइंडसेट बना लेता है। वो घर में किसी रिश्तेदार की तरह रहती, लेकिन धीरे-धीरे मैंने उन्हें अपना बना लिया। जब पहली बार बच्चों ने इडली खाना पसंद किया और अंग्रेजी में बोलना शुरू किया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। इस दौरान मैं एक लॉ फर्म में काम कर रही थी। कंपनी को एडॉप्शन के बारे में बताया तो नियम के मुताबिक, उन्होंने मुझे 6 हफ्ते का समय दिया, जबकि जन्म देने वाली मां को 26 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलती है।

सामाजिक और कानूनी लड़ाई साथ-साथ
मैं एक तरफ कानूनी लड़ाई लड़ रही थी तो दूसरी ओर सामाजिक। हमारे समाज में जो मां बच्चे को जन्म देती है तो उसे सलाह देने वाले बहुत होते हैं, लेकिन मुझे कोई सलाह नहीं मिली। जैसे समाज हमें मां समझता ही नहीं। हमें समाज अजीब सी नजरों से देखता है। लोग सलाह देने के नाम पर चुप हो जाते हैं, लेकिन मुझे अपने बच्चों को बहुत प्यार देना था। उन्हें अच्छे स्कूल में दाखिला कराना है। उन्हें हर वो बात सिखानी है जो कोई जन्म देने वाली मां सिखाती। अब ये बच्चे इसे अपना घर समझते हैं। मेरी कंपनी और साथियों ने भी बहुत मदद की।